सरकारी आवास

सरकारी आवास

 

वर्मा जी,जो की स्टार तो नहीं, एक साधारण और सच्चा इंसान …

ना जी ना एक सीधे, सच्चेऔर असाधारण इन्सान है

 

सरकारी आवास

 

 

छोटा सा गांव जो हरियाली के बीच, नदी के उस पार, भोले-भाले लोग, कम आबादी , प्यार, सामजस्य

और खुशहाली से भरा एक सुन्दर सा गांव।

जहाँ वर्मा जी की नई-नई पोस्टिंग हुई ,एक सरकारी अस्पताल में। 

सरकारी अस्पताल के पास ही सरकारी आवास… अस्पताल गांव के आखरी छोर में था।

 

और गांव के चारो तरफ जंगल ही जंगल था। (सरकारी आवास)

 

वर्मा जी और उनका पूरा परिवार उस सरकारी आवास में रहने आ गए।

बच्चे को गांव के सरकारी स्कूल में भर्ती करवा दिया वर्मा जी ने। 

 

 

वह सरकारी आवास था तो छोटा लेकिन जरुरत कम होने के वजह से वो बहुत बड़ा था|

 

न कोई सामान न कोई रुकावटे, सिर्फ ख़ुशी प्यार और बच्चो की शरारते। …

सरकारी आवास में एक हॉल, एक किचन, एक बेड रूम।

घर के बाहर बड़ा सा खुला आँगन(एक छोटा सा आशियाना जहाँ खुशिया बसती थी )। 

 

बच्चो को यह घर बहुत बड़ा लगता था।

क्योकि वो बच्चे थे जनाब…माँ की डाट, पापा का प्यार और एक छोटा सा चॉकलेट …बस बहुत है।

 

गांव के आखरी छोर में होने के साथ उस समय, और उस गांव में पक्की मकान का …SORRY पक्का घर का होना।

मकान तो अब बनते है, भी बहुत बड़ी बात थी और नया घर था।

 

जिसके कारण वह घर कुछ अलग था बाकि गांव के घरो से…बड़ी-बड़ी खिड़किया, हॉल  से लगा हुआ एक रूम…

जिसमे एक बड़ी खिड़की बनी हुई थी।

 

एक छोटा सा किचन और उस किचन में वर्मा जी पत्नी।

सिर्फ जरूरत के सामान होने के कारण घर में बहुत जगह थी। 

घर का बड़ा बेटा होने के कारण जिम्मेदारियां भी बड़ी, उम्मीदे भी बड़ी, परिवार भी बड़ा, बच्चो के सपने भी बड़े …

 

बस छोटी थी तो वर्मा जी के तनख्वाह।

 

 

हरियाली है पहाड़ है, नदी है तो बारिश भी होगी…और होती भी थी।

लाइट तो मानो इस गांव में सपना होता था, 15 -20 दिन बाद एक बार आ जाये तो त्यौहार समझो।

बाकि समय लैंप से दोस्ती कर रखे थे, जो कम से कम बेवफा नहीं थी।

 

जो अपने आदेश पर बुझती और जलती। 

 

पास ही एक नदी, उस नदी का कल-कल आवाज घर तक सुनाई देता था।

मानो घर ही नदियों के बीच बसा हुआ हो।

रात में चारो तरफ जुगनू और पास में महुए का पेड़ जहाँ झींगुर की आवाज भी तेज सुनाई देती थी।

चारो तरफ शांति  और सन्नाटा थोड़ा डरावना और थोड़ी रुमानियत। 

अस्पताल के पास केवल 3 घर उसमे भी 2 खाली और 1 में वर्मा जी।

 

अस्पताल में स्टाफ भी नहीं के बराबर …सो जिम्मेदारी ज्यादा, वर्मा जी पर थी।

अपना काम ईमानदारी से करते और गरीबो की सेवा में अपना खुशी तलाशते थे।

शाम को … वर्मा जी उसके साथ एक लैंप और एक उनका रफ़्तार चेतक मतलब सायकल, जिसमे एक

बैग …सदैव मरीजों की सेवा में तत्पर , निकल पड़ते थे।

 

कहा जाये तो वर्मा जी अपने जीवन में छोटी-छोटी ख़ुशी से संतुष्ट थे और अपने काम  से प्यार करते थे। 

धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते गए, जरूरते भी बढ़ती गई ,एक-एक करके  सामान घर में आता गया टीवी,

पंखा , कूलर आलमारी आदि।

 

जिसको रखते समय कभी नहीं लगा की ये घर अपना नहीं है।

जरूरते बडी तो घर भी छोटा हो गया।

 

लेकिन खुशीया मानो थम सी गयी थी, जैसे बोलती हो मै यही रहूंगी मुझे कही और नहीं जाना या यु कहे

जीवन का खुशनुमा पल था।

 

जो हर किसी के जीवन में कभी न कभी आता है। 

  

जिसे फिर से जीने का मन करता है।  पर समय है साहब फिसलेगा जरूर दुख: सुख दो पहलू है जीवन

के ये दिन भी बीत जायेगे और बीत गए… 


बच्चे बड़े हो गए एक – एक  करके सभी  बाहर पढ़ने चले गए।

गांव भी बड़ा हो रहा था, काम का दबाव भी बड गया।

अब समय का पता नहीं चलता था, साथ ही बच्चो का भविष्य का सोच के ख़ुशी ही मिलती थी। 

और उनको अपने दिए गए संस्कारो पर गर्व भी था।

 

समय कैसे निकलता है पता ही नहीं चला, मानो समय में पंख लग गए हो।

 

और लग भी गए क्योकि अब बड़ी बेटी की शादी हो गयी, अब खर्च का बोझ और भी बड़ गया।

बेटो को पढ़ाने और सुविधाएं देने में अपने लिए नया सायकल भी नहीं ले पाए।

जो पहली तनख्वाह में लिए थे वही सायकल जिंदाबाद थी हमेशा। बेटो के लिए कंप्यूटर, मोटर सायकल,

और समय समय पर सारी जरूरत का सामान लेते रहे,बच्चो की परवरिश बखूबी करते रहे।

 

और अपना शौक तो शायद…SORRY अपनी जरूरत  को भी भूल गए थे, शौक तो दूर की बात थी।

 

अब बच्चो की पढ़ाई भी खत्म हो गयी थी देखते देखते सभी बच्चो की शादी भी हो गई। 

उसके 4 साल बाद रिटायरमेंट का समय भी आ गया और अब सरकारी आवास को छोड़ने का समय भी आ गया।

वही आवास जहाँ कई सपने बने, सवरे, बिखरे, शैतानिया, खुशिया गम, रोना, हसना और जिंदगी को

सीखना और सीखकर जीना सब उसी आवास में।

गांव  में वह आवास अब कम सुन्दर और छोटा लगता था साथ ही सुविधाओं की कमी भी लगती थी।

एक समय जो घर उस गांव की सुन्दर परी थी अब वो कही भीड़ भरे घरो में दब गयी थी। 

 

 

रिटायरमेंट का लेटर आया और उस आवास में वास करने का समय 6 महीना दिया गया तब महसूस

हुआ की जिस घर में सपने सजाये, जीये , वो तो अपना था ही नही|

कैसे वर्मा जी की पत्नी ने घर के चारो तरफ बगीचा बना दिया था, वहां सुन्दर-सुन्दर फूल खिले होते, जो

घर को अति सुन्दर बना देते थे।

अब सब को समेटना पड़ रहा था चाहे सामान हो , या फिर यादे। 

 

 

जिंदगी के भागदौड़ में अपना खुद का घर भी नहीं बना पाये, और ना  हीं पैतृक घर था। 

तो फ़िलहाल उनके पास कोई अपना घर …SORRY  अब मकान भी नहीं था।

लेकिन सुकून था की नौकरी पूरी ईमानदारी से किया, और एक गुरुर भी की बच्चे की परवरिश अच्छे से की। 

 

 

 

कुल मिला कर जीवन के सारे गणित में प्लस माइनस करके वर्मा जी ने अपने कर्तव्यों का पालन बहुत ही

सुन्दर ढंग से किया।

सवालों को अपने ही अंदर प्लस माइनस गुना भाग करके जीवन को जोड़ने का अद्भुत काम धीरे धीरे

और शांति से किये।

 

और जो अभी तक जारी है। 

 

 

तो ये थे वर्मा जी जो की स्टार तो नहीं, एक साधारण और सच्चा इंसान …  ना

जी ना एक सीधे, सच्चे और असाधारण इन्सान।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *