अमरुद

 

amrud(part-2)।अमरुद एक लम्बे इम्तिहान की कहानी ।

 

                       

 

यह कहानी है आभा की, जो एक गृहणी है, उसके साथ एक घटना के बाद जीवन के

बदलाव की कहानी है….  साथ ही यह बताने की कोशिश की है की, परिस्थिति कैसे भी हो

माँ का ममत्व हमेशा जिन्दा रहता है। यह कहानी अमरुद से शुरु हुई इसलिए इसे अमरुद नाम दी हु आइये शुरु करते है

कहानी का पहला भाग।

 

 

संजय बोला उस वक्त और अब में फर्क है, बस तुम चली जाओ ताकि नई जिंदगी नई

तरीके से मै शुरू कर संकू….amrud(part-1 )।अमरुद एक इम्तिहान की कहानी ।।

 

 

 

 

आज आभा के चेहरे में बहुत दिनों बाद प्यारी सी मुस्कान थी अमरुद को देख कर,

और हो भी क्यों न …लल्ला को मीठे अमरुद जो पसंद थे |

 

लल्ला आभा का 4 साल का बेटा है, उसे पके अमरुद बहुत पसंद है ……आभा अमरुद के

तरफ देख कर

 

मुस्कुराते हुए बोली लल्ला कितना खुश हो जायेगा अमरुद को खा कर ….

पीछे ही आभा की भाभी खड़ी थी, तुनक कर बोली आभा तेरा लल्ला अब लल्ला नहीं रहा,

अब वो 20 साल का हो गया है |

 

आभा को वही व्हील चेयर पर छोड़ कर चली गई ,कहते हुए मै भी बहु इसलिए तेरा सेवा

कर रही हूँ।

 

लेकिन आभा अपने लल्ला में ही खोई हुई थी और अमरुद को ही देखे जा रही थी।

 

आभा के शादी को दो साल के होते होते लल्ला आभा की गोद में आ गया, आभा ने अपने

बेटे का नाम कान्हा रखा और उसे लल्ला ही बुलाया करती थी।

 

आभा के ससुराल में सास-ससुर, ननंद,  देवर  और संजय  जो आभा का पति है ,  एक

भरापूरा परिवार था।

 

बड़ा सा घर, घर के पीछे बाड़ी, जिसमे अमरुद, आम, बेर और भी बहुत से पेड़ थे ….. आभा

के शादी के बाद जो भी आभा के घर आता बस यही कहता आभा के भाग बहुत ऊंचे है |

 

लल्ला के आते ही सोने में सुहागा हो गया, बेटे के आने से सब बहुत खुश थे।

आभा भी बहुत खुश थी, संजय भी बहुत प्यार करता था आभा से ……

 

आभा का समय घर में कैसे बीत जाता आभा को पता ही नहीं चलता, सुबह उठते ही सबके

सेवा में जी-जान से जुट जाया करती थी |

 

आभा के लम्बे बाल, खुबसुरत चेहरा और साथ ही खुबसुरत व्यक्तित्व, जो सबको आकर्षित

करता और बिना आभा के तारीफ  किये नहीं रह पता कोई …..

 

लल्ला की सारी हरकते आभा को बहुत भाती, और कब लल्ला चार साल का हो गया उसे

पता ही नहीं चला।

 

लल्ला को मीठे अमरुद बहुत पसंद थे, अमरुद का पेड़ घर पर ही था, जिस पर बहुत ही

 मीठे अमरुद लगते थे |

 

रोज  आभा ही अमरुद तोडा करती थी …..

आज भी खाना खा कर आभा लल्ला को ले कर अमरुद लेने गई , जाते ही लल्ला की नजर

सबसे ऊपर वाले अमरुद पर पड़ी जो बहुत पका हुआ स्वादिष्ट लग रहा था |

 

लल्ला जोर- जोर से आभा से कहने लगा माँ वो अमरुद दो न ….

आभा अमरुद डंडे से तोड़ लिया करती थी… लेकिन ये कुछ ज्यादा ऊपर था जो डंडे के

पहुच से दूर था |

 

आज घर में भी कोई नहीं था, जो अमरुद तोड़ने में आभा की मदद कर पाता …

 

लल्ला के लगातार जीद  से आभा ने सोचा क्यों न पेड़ पर आज मै  ही चड़ जाऊ , और थोड़ी

देर बाद कोसिस करके ऊपर पहुँच भी गई आभा |

 

अमरुद को तोड़ कर जैसे ही नीचे फेका, अमरुद लल्ला  के सर पर जा गिरा और लल्ला

जोर-जोर से रोने लगा |

 

घबराहट में आभा का पैर फिसला और वो जमींन पर जा गिरी ,…..

आभा ने जब आँख खोला चारो ओर  सभी बैठे थे बस लल्ला नजर नहीं आ रहा था |

साथ ही दर्द बहुत ज्यादा  हो रहा था, सो उठने की ताकत ही नहीं थी |

 

और बाकि सब जानना चाहते थे आखिर हुआ क्या था,कोई कुछ पूछता इससे पहले ही

आभा बोली लल्ला कहाँ है |

 

सबने बताया वो ठीक है , और खेल रहा है।

आभा की स्थिति  को देखकर सबने आभा को हॉस्पिटल ले जाने का सोचा |

 

हॉस्पिटल में डॉक्टर जाँच करने के बाद बोले, आभा अब कभी बैठ नहीं पायेगी …

कमर में गहरी चोट है, नीचे का हिस्सा बेजान हो गया है |

 

यह बात संजय के कानो में जैसे पहुची  कुछ सोचने में डूब गया और सास, ननंद सबको

जैसे साप सूंघ गया |

 

और अब आभा घर जाने वाली थी एक सप्ताह बाद ….

 

आभा अपने कमरे के बिस्तर में लेटी थी बाहर  से लल्ला की आवाजे आ रही थी, किचन से

बर्तन की और संजय ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था …..

 

सब कुछ पहले जैसे ही हो रहा था बस आभा की जिंदगी रुक गई थी |

सुबह से शाम का पता पहले आभा को पता ही नहीं चलता था ,और अब हर सेकंड

एक –एक साल जैसे लगता था….

 

हॉस्पिटल से आये एक सप्ताह बीत गया….इस बीच संजय से बात भी नहीं हुई आभा की |

संजय जो बहुत प्यार किया करता था आभा से,अब उसके पास भी टाइम नहीं था |

 

लल्ला को सिर्फ देखने के लिए आभा की आंखे तरस जाया करती, लल्ला अब अपनी

दादी के पास ही सो जाया करता था |

 

सुबह और शाम निकिता, आभा की ननंद आती और आभा की पट्टी करती नहलाती, और

बाल बना कर चली जाती |

 

दिन में दो बार सासु माँ खाना देने आती, और संजय को दवाई की बदबू पसंद नहीं थी,

तो वो आता ही नहीं |

 

आभा को एक सप्ताह में ही अपनी स्थिति और वो किसी के लिए कितना आवशयक है

समझ चुकी थी |

 

अब एक महीने होने को आ गया था ……

और एक दिन आभा की सास कमरे में दोपहर में आई , आभा को यकींन नहीं हो रहा था।

 

सास पास आकार बोली तुम अब बिस्तर में रहोगी हमेशा घर के साथ-साथ तुम्हारा भी

ख्याल रखना पढता है।

 

और संजय की उम्र ही क्या हुई है , ऑफिस से आये तो कोई तो हो उससे बात करने के लिए।

 

अब तक आभा समझ चुकी थी सासु माँ क्या कहना चाहती है …. और धीरे से कहा माँ जो आप

लोग को सही लगे।

सासु माँ मुस्कुराते हुए बोली लड़की मैंने देख ली है …अगले महीने शादी का सोच रहे हम

लोग।

 

आभा के मन में एक ही बात आ रहा  था … मै इतना ही करीब थी संजय की सातों जन्म का

रिश्ता ऐसा होता है।

 

मेरे अपाहिज होते ही सब मुझसे दूर हो गए ….

 

पैरो की आहट ने आभा को उसके गहरे सोच से बाहर निकाला , थोडा आश्चर्य भी हो

रहा था….. क्योकि, ये आहट संजय की थी।

 

संजय को कमरे में देख कर ख़ुशी से उठने की नाकाम कोशिश करने लगी …..

मुस्कुराते हुए आभा ने कहा आओ बैठो संजय बहुत दिन बाद आये हो यहाँ।

 

संजय खीच कर बोला माँ ने नहीं बताया तुम्हे ….और कब तक सेवा करवाना चाहती हो

सब से, अपने घर चली जाओ।

 

आभा की आँखों में आंसू थे …..और धीरे से कहा संजय एक महिना ही  हुआ है, और

मैंने सबकी देखभाल 6 साल की है….. उस वक्त सब मेरी तारीफ करते नहीं थकते थे।

 

संजय बोला उस वक्त और अब में फर्क है, बस तुम चली जाओ ताकि नई जिंदगी नई

तरीके से मै शुरू कर संकू….

                                                                                                   

                                                                                                                                 

                                                                                                                                                                                                         To be continued….

                             

                                                                                                                     

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